गुरुवार, 18 फ़रवरी 2021

Key monestry

दोस्तो जैसा की आप सब जानते हो कि में कीह मठ के बारे में आप सब को बताने जा रही हूं तो दोस्तो अगर आप कीह मठ के बारे में बारीकी से जानकारी  चाहते हो तो आप मेरे ब्लॉग को पूरा पड़े जिसमें मैने कीह मठ के बारे में सम्पूर्ण जानकारी देने की कोशिश की है 

जैसा कि आप इस अद्भुत मठ के अंदर कदम रखते हैं, आप इसकी खूबसूरत दीवारों को देखेंगे जो चीनी संस्कृति से प्रभावित 14 वीं शताब्दी की मठ वास्तुकला से युक्त भित्ति चित्रों और चित्रों से आच्छादित हैं। यह अपनी दुर्लभ पांडुलिपियों, अद्वितीय पवन उपकरणों, बुद्ध की मूर्तियों और हमलावरों से बचने और मठ की रक्षा करने के लिए हथियारों का एक अद्भुत संग्रह के लिए भी लोकप्रिय है।


 कीह मठ लाहौल जिले में एक बेहद प्रसिद्ध मठ है  यह मठ  एक खूबसूरत पहाड़ी पर स्थित है समन्दर तल से कीह मठ की ऊंचाई 4,166 मीटर यानी (13504 फीट) है ओर इस मठ को एक हज़ार साल पुराना बताया जाता हैं स्पीति घाटी का यह सबसे पुराना, जटिल ओर  बड़ा मठ हैं  इस मठ की स्थापना 13वीं  शताब्दी में हुई थी।  कीह का अर्थ होता है ( चाबी ) ओर ( मठ ) आश्रम । 

  

    मठ का  इतिहास

 कीह  मठ की स्थापना 11 वीं शताब्दी में हुई थी कीह मठ  का वास्तुकार ड्रोमटन  है   इसकी दीवारों में मनमोहक मूर्तिया चित्रित हैं जो इस मठ की खूबसूरती में चार चांद लगा देती हैं इन चित्रों और मूर्तियो को 14वी सदी में मठवासी वास्तुकला का एक उदाहरण हैं जो उस समय बहुत प्रचलित थी यह वास्तुकला चीनी वास्तुकला से प्रभावित हो कर विकसित की गई है बौद्ध  इस मठ में लगभग 100 भिक्षुओं को बौद्ध धर्म की शिक्षा दी जाती थी यह मठ शिक्षा के लिए भी प्रचिलत था। वर्ष 1830 में लद्दाख ओर कुल्लू के बीच युद्ध यहां युद्ध हुआ था जिसे इस मठ को ओर यहां के आस पास के क्षेत्रों को  काफी क्षति पहुंची थी। ओर उसके 1841 में यहां एक ओर युद्ध हुआ था जो गुलाम खान और रहीम खान की सता में उनकी सेना जिसका नाम  डोगरा  रखा गई था उन्होंने इस क्षेत्र को काफी गंभीर रूप से क्षति  पहुंचाई  थी। इतनी गंभीर ओर कठिन मुश्किलों का सामना करते हुए भी कि मिनिस्ट्री का नजारा बेहद खूबसूरत और आकर्षक दिखाई देता है और वो बेहद मजबूत है

    


मोंक (Monk) - (किसी धार्मिक समूह का सदस्‍य जो मठों में वैरागी जीवन व्‍यतीत करते हैं; संन्‍यासी, मुनि, वैरागी)



 

मठ की कुछ खास बातें

मोनेस्ट्री  में  बौद्ध धर्म की पढ़ाई के साथ-साथ  हिमाचल बोर्ड की शिक्षा भी दी जाती है यहां रह रहे मुनि के लिए रहने खाने  ओर सोने की व्यवस्था यहीं की जाती है यहां इस मठ में तिब्बत से लाई गई पुस्तके ओर कपड़े से बनाई पेंटिंग भी हैं पर्यटकों के लिए यह बहुत एतिहासिक ओर आकर्षिक केंद्र हैं 1840 के दशक में यहां पर आग लग गई जिसके कारण पूरा का पूरा मठ जल कर राख हो गया था और फिर बाद में इस मठ का फिर से पुनः निर्माण कर लिया यहां लगभग 250-300 लामाओं का घर, जो तिब्बती बौद्ध धर्म में आध्यात्मिक नेता हैं, तेजस्वी मठ, लामा के लिए तिब्बती बौद्ध भिक्षुओं के गेलुग संप्रदाय द्वारा चलाए जा रहे पूरी तरह कार्यात्मक धार्मिक प्रशिक्षण भूमि के रूप में कार्य करता है। 

   




यात्रा का सही समय

  कीह मठ की यात्रा का सही समय जुन से अक्तूबर के बीच का होता है इस समय मौसम  साफ रहता है और आपको किसी भी दिक्कत का सामना नहीं करना पड़ेगा पर यदि आप सर्दियों में यहां के ख़ूबसूरत नजारे का लुफ़्त उठाने चाहते हैं तो आपको मार्च से जुन के बीच के समय यहां आना चाहिएं बर्फ से ढंकी पहाड़ियां  यहां के नज़रे को चार चांद लगा लेती हैं

 
 

 कैसे पहुंचे

किह मोनास्ट्री काजा से 14 किमी दूर स्थित है जो मठ के लिए निकटतम बस स्टेशन है। प्रमुख मठ तक पहुँचने के लिए, आपको काजा तक पहुँचना होगा चाहे आप मनाली से आ रहे हों या शिमला से। मनाली और शिमला दोनों से काजा तक कई बसें चलती हैं, जो आमतौर पर काजा तक पहुंचने में लगभग 10 से 12 घंटे का समय लेती हैं। 

     




लेबल:

सोमवार, 7 दिसंबर 2020

lahol and Spiti valley

 स्पीति घाटी  हिमाचल प्रदेश के राज्य में स्थित है यह   समन्दर तल से 12500 मीटर की ऊंचाई  पर है  स्पीति घाटी उच्च पर्वत और श्रृंखलाओं से गिरी हुई है स्पीति घाटी का अर्थ मध्य भूमि है अर्थात् भारत और तिब्बत के बीच की भूमि।  यहां का नजारा देखने पर्यटक दूर-दूर से आते हैं स्पीति घाटी  की खूबसूरत पहाड़ियां स्थिति को और ज्यादा खूबसूरत बनाती है लाहौल और स्पीति घाटी दोनों ही एक दूसरे से विभिन्न है। लाहौल घाटी की यात्रा के लिए परमिट प्राप्त करना बेहद मुश्किल है यहां की एक विशेष बात यह भी है कि  लाहौल ओर स्पीति की अपनी कोई मुख्य भाषा नहीं है यहां विभिन्न बोलियां बोली जाती हैं।यहां बौद्ध धर्म के लोग ज्यादा निवास करते है हिमाचल प्रदेश में किन्नौर ओर लौहोल स्पीति में ही ज्यादा बौद्ध धर्म के लोग निवास करते है।



लाहौल शब्द को तिब्बती भाषा में (गार्जा) मतलब अज्ञात देश एवं मौन कहा जाता हैं  लाहौल घाटी में वास्तव में मिश्रित प्रजाति के लोग रहते हैं तिब्बती भाषा में लाहौल को लहोयुल   भी कहा जाता है तिब्बती शब्द लहोयुल  का अर्थ दक्षिणी देश से है  इसका अर्थ  है देवताओं का देश।  

मठ का अर्थ

मठ का अभिप्राय एक ऐसे संगठन से है   जहां उनके गुरु अपने शिष्यों को  शिक्षा इतियादी प्रदान करते थे ये गुरु धर्म गुरु होते हैं इनके द्वारा दी गई शिक्षा मुख्य रूप से आध्यात्मिक होती है एक मठ में कार्य के अतिरिक्त समाजिक सेवा एवं साहित्य इतियादी से संबंधित कार्य भी होते हैं।

लाहौल स्पीति घाटी में घूमने की जगह

सुरजताल

स्पीति घाटी में आप  सुराजताल झील देखने जा सकते है जो कि भारत की तीसरी सबसे बड़ी झील मानी जाती हैं यहां का अद्भुत नजारा किसी का भी में मोह लेता है। 



बारालाचा ला

यह दर्रा बारालाचा पास के नाम से जाना है यह दर्रा लाबौल ओर लद्दाख के बीच 1616फीट की ऊंचाई पर एक संपर्क के रूप में कार्य करता है

        


ला का अर्थ 

ला एक तिब्बती शब्द है जिसे हिंदी भाषा में दर्रे कहा जाता है कायदे से इससे दर्रे ही कहना चाहिए जैसे- बारालाचा ला का अर्थ बारालाचा दर्रे   लेकिन  यह प्रयोग फिर भी प्रचलित है 


ताबो मठ

इस मठ का निर्माण 996 ई में हुआ था यह बोध धर्म के लोगों के लिए आस्था का प्रतीक माना गया हैं यह मठ यहां का सबसे पुराना मठ बताया जाता है इस मठ के चारो ओर ताबो शहर है जो इसकी खूबसूरती को चार चांद लगा देता है

                     


की मॉनेस्ट्री 

इस मठ के समीप एक नदी भी बहती है जिसे स्पीति नदी कहा जाता हैं यह स्थान भगवान बो द्ध की मूर्तियों के साथ ओर कई प्राचीन  पुस्तको का अद्भुत संग्रह है 

              



कुंग्री

कूंग्री स्पीति का  दूसरा पुराना मठ हैं यह स्पीति पिन घाटी में स्थित एक ही ऐसा मठ है जो निंग्मापा क्रम का है ये लगभग 1330 ई  के  आसपास बना है

  

   

काई मठ 

काई मठ स्पीति घाटी का सबसे पुराना ओर सबसे बड़ा मठ है यह तिब्बती बौद्ध मठ के नाम से भी जाना जाता है  यह मठ वस्तुकला का एक उत्कृष्टठ उदाहरण है यह समन्दर तल से 4,166 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है

           



धनकर गड़,झील

धनकर गड़ एक चोटी पर स्तिथ है यह मुख्य घाटी में है जिसके चारो ओर हरियाली है धनकर गड़ से ही 45की0मी की दूरी पर धनकर झील स्थित हैं  यहां का नजारा एक अद्भुत दृश्य को दर्शाता है

 


किब्बर

किब्बर एक बहुत ही खूबसूरत गांव है यह काजा से केवल 16किमी की दूरी पर स्तिथ है किब्बर गांव दुनिया का सबसे ऊंचा गांव है ओर यहां देखने के लिए वन्य जीव अभयारण्य भी है जो इस गांव की खूबसूरती में चार चांद लगा देता है

  

चंद्रताल झील 

चंद्रताल हिमालय की ऊंचाई पर स्थित एक झील है जो अपनी मनमोहक सौंदर्य के लिए प्रसिद्ध है यह समन्दर तल से 43,00 मीटर की दूरी पर स्थित है। यह झील चंद्रमा जैसी दिखाई पड़ती  है और इसीलिए चन्द्रमा जैसे आकार के कारण ही इस झील का नाम चंद्रताल पड़ा

                  


  गयू  मम्मी स्तूप

 गयू ममी एक बेहद अद्धभूत  ओर  आश्चर्य  वाला स्थान हैं।  यह मानना मुश्किल होगा कि यहां एक मम्मी का स्तूप हैं किंतु अधिकांश लोग इस स्तूप के अस्तित्व के बारे में नहीं जानते हैं ये जगह उतनी प्रसिद्ध नहीं है।  स्थानीय लोगों के अनुसार कहा जाता है कि यह मम्मी सदियों से यहां है और इस मम्मी के बाल ओर नाखूनों में निरंतर बढ़ोतरी हो रही है गयू में मम्मी लगभग 550 साल पुरानी बताई जाती हैं।





    








यात्रा का समय

  लाहौल स्पीति घाटी का यात्रा का सबसे अच्छा समय गर्मी का  रहता है जिससे आप अपने परिवार के साथ अच्छा समय व्यतीत कर सकते है ओर आपको यात्रा में किसी भी परेशानी का सामना नहीं करना पड़ेगा 

आप लाहौल स्पीति की यात्रा बस या टैक्सी के द्वारा भी कर सकते है यदि आप दिल्ली से यात्रा कर रहे है तो  आपको लाहौल स्पीति घाटी तक 19 या 20 घंटे लगेंगे  पर यदि अा अटल टनल से यात्रा करेंगे तो आपको लगभग 5 घंटे की यात्रा कम हो जाएगी यानी आप 15 या 16 घंटे में ही लाहौल स्पीति पहुंच जाएंगे 

बस द्वारा यही आप यात्रा करते है तो आपको पहले दिल्ली से शिमला के लिए बस लेनी पड़ेगी ओर फिर वहां से आप किन्नौर या रिकांगपिओ वाली बस में भी यात्रा कर सकते है ओर फिर आप रिकांगपिओ से लेह के लिए भी बस में यात्रा कर सकत हैं और लेह से आप स्पीति घाटी की वादियों का आनंद ले सकत है 


    हमारे ब्लॉग में हुई त्रुटियों को क्षमा करे।

   हमारे द्वारा हुई गलतियों को  हमे  टिप्पणी करके अवश्य         सूचित करवाएं।







  



सोमवार, 2 नवंबर 2020

Krishna Mandir yulla kanda

 आज हम आपको किन्नौर के एक ऐसे अनोखे मंदिर के  बारे में बताने जा रहे हैं जोकि  में एक प्राकृतिक झील में  है जिस झील के अंदर श्री कृष्ण का एक अद्भुत मंदिर स्थित है यह कृष्णा जी का सबसे अधिक उंचाई वाला   मंदिर हैं। यह मंदिर(3,895) मीटर  तक का एक आध्यात्मिक ट्रैक हैं।  यह बहुत ही चौंकाने वाली बात है कि यह झील सबकी तकदीर तय करती है.  यहां जगह किन्नौर के  यूला कांडा में स्थित है यह मंदिर समंदर तल से  12000 फीट की ऊंचाई पर स्थित है। यह  दुनिया का एक ही ऐसा  कृष्णा मंदिर  है जो कि एक झील के अंदर स्थित है। इस मंदिर में  पहले  केवल श्री कृष्णा जी की पत्थर की मूर्ति थी जिसकी पूजा पांडव किया करते थे पर अब वहां नयी मूर्ति स्थापित की गई  हैं 



पांडवो ने बनाया मंदिर

 पुराणिक मान्यताओं के अनुसार ऐसा कहा जाता है कि इस झील में मंदिर का निर्माण पांडवो ने किया था  इस मंदिर की खासियत यह है कि यह केवल जन्माष्टमी के पर्व  पर ही खुला रहता है कहा जाता है कि पांडवों ने यह मंदिर श्रीकृष्णा जी के लिए बनाया था  और यह भी मान्यता है कि जो भी सच्चे मन से यहां जन्माष्टमी में दिन आता है और इस मंदिर में पूजा करता    है उसकी मनोकामना अवश्य ही पूर्ण होती हैं स्थानीय लोगो का यह भी कहना है कि युल्ला के ग्रामीणों ने कुछ समय पहले इस झील के पानी को खेत की संचाई के लिए नहर बनाने की कोशिश भी की थी लेकिन नहर का पानी वापस झील की तरफ मुड़ा हुआ था ये कैसे हुआ इसका रहस्य कोई जान नहीं पाया जब इस झील के पानी को मोड़ने की बात देवताओं से पूछी गई तो उन्होंने कहा कि यह झील बहुत पवित्र है  और इस झील के पानी के साथ कोई भी छेडखानी ना कि जाए



किन्नौर की शान टोपी 

किन्नौर की शान किन्नौर की  टोपी का यहां बहुत महत्त्व है मंदिर के साथ ही  एक पवित्र झील है और इस झील की मान्यता यह है कि यहां किन्नौर की टोपी को उल्टी कर इस झील की जलधारा में बहाया जाता है और माना जाता है कि इस की ज़ल धारा में यदि टोपी तेर गई और डूबी नहीं तो उस भक्त की मनोकामना अवश्य पूर्ण होती हैं और उस व्यक्ति का आने वाला साल अच्छा रहेगा और यदि डूब गई तो ऐसा  माना जाता है कि उसका आने वाला साल अशुभ माना जाता है  तो वह भक्त मंदिर में पूजा अर्चना  कर भगवान  से माफी मांगते है और आने वाले साल के अच्छे की कामना करते है  दंत कथाओं के अनुसार  इस मंदिर ओर झील की खासियत यह भी है कि इस झील के चारो ओर बौद्ध धर्म की पवित्र पतीकय(दारछवद) लगाई गई है जो इस झील और इस मंदिर की खूसूरती को चार चांद लगाती है



 जन्माष्टमी पर्व 

 जन्माष्टमी के पर्व पर यहां  प्रत्येक वर्ष एक जिला स्तरीय मेला आयोजित किया जाता है जिसमें किन्नौर के वासी और बौद्ध धर्म के लोग एकत्रित होते हैं जन्माष्टमी के दिन सुबह सारे गांव वासी भी एकत्रित होते है और यहां के पुजारी 16 रंगो के फूलों को इकट्ठा कर पूजा करते है और भक्त जनो में भांट देते हैं यहां जन्माष्टमी का उत्सव बड़े ही धूम धाम से मनाया जाता है।  सब श्री कृष्णा जी के भजन कीर्तन करके श्री कृष्णा जी को प्रसन्न करते हैं  यहां पर जन्माष्टमी का पर्व  बुशहर रियासत से भी  जुड़ा हुआ है  मान्यता है कि बुशहर रियासत के राजा केहरी सिंह  जी के समय से यहां यह पर्व मनाया जाता है 




कैसे पहुंचे 

आपको युला कांडा के लिए शिमला या चंडीगढ़ से आसानी से बस और टैक्सी के माध्यम से आसानी से सफर कर सकते है आपको यहां से एचआरटीसी कि बस के माध्यम से कम खर्चे पर किन्नौर की वादियां घूम सकते है आप शिमला से किन्नौर की कोई भी बस में सफर कर सकते हैं फिर पर्यटक को किन्नौर के  टापरी स्टेशन तक लगभग 200कि0 मि0 की यात्रा करके वहां पहुंचना होता है टापरी स्टेशन से शाम 4बजे से पहले बस लेनी होती है और उर्नी गांव को पार कर यूल्ला पहुंचते हैं। एक दिन वहां रुकने के बाद दूसरे दिन युल्ला कांडा के लिए लगभग 7की0 मी0 की चड़ाई को पार करना होता है वह चाड़ाई पार करने के बाद आपको युल्ला कांडा के श्री कृष्णा मंदिर जी के दर्शन प्राप्त होंगे



जरूरी सूचना 

युल्ला कांडा को जाने के लिए तीन रास्ते है मुख्य रास्ता एक ही है रास्ता ना भटके कृपया अकेले ना जाएं यदि आप रास्ता भटक गए तो जंगली जानवरों का शिकार भी हो सकते हैं ये ट्रैक केवल जन्माष्टमी के पावन पर्व पर ही करे और समय यह ट्रैक बंद रहता हैं



 खाने की सुविधा

खाना  की सुविधा  युल्ला केमटी के द्वारा आयोजित कि जाती हैं किन्तु आप रास्ते में खाने के लिए कुछ आवशयक़ चीजे ले जाना ना भूले



 धन्यवाद

हमारे ब्लॉग में हुई गलतियों को क्षमा करें। ओर हमें टिप्पणी में जरूर बताएं कि आपको हमारा ब्लॉग कैसा लगा।

















मंगलवार, 6 अक्तूबर 2020

रोहतांग अटल टनल

  दुनिया की सबसे लंबी सुरंग 'अटल टनल' के नाम से  हिमाचल प्रदेश के रोहतांग में स्थित हैं  इस सुरंग की लम्बाई 9.02 किलोमिटर है। यह सुरंग समद्र तल से 10 हजार (यानी 3000 मीटर) 40 फीट की ऊंचाई पर स्थित है  यह दुनिया में सबसे लंबी और सबसे ऊंचाई पर बनी  राजमार्ग सुरंग  है जिसका उद्धघटन प्रधान मंत्री  नरेंद्रमोदी जी ने किया है यह उद्धघाटन शनिवार 3 अक्टूबर 2020 को प्रातः 10 बजे  किया गया। यह सुरग करीब 10.5मीटर चौड़ी और 5.52मीटर उंची हैं।


रोहतांग दर्रे की सुरंग को अटल टनल का नाम क्यों दिया गया?

 अटल बिहारी वाजपेई जब देश के प्रधानमंत्री थे तब 3जून 2000 को  अटल बिहारी बाजपेई जी ने रोहतांग दर्रे के नीचे रणनीतिक सुरंग का एक ऐतिहासिक निर्णय किया था यह अटल बिहारी जी का सपना था टनल की  आधारशिला 26 मई 2002को रखी गई थी तब केंद्रीय मंत्रालय की बैठक में अटल बिहारी जी को सम्मान के साथ इस टनल का नाम उनके नाम पे रखने का निर्णय लिया गया।और यह सुरंग आधुनिक तकनीक और संरचनाओं के साथ  साथ बनाई गई है जिसे की लेह- लद्दाख के किसानों, युवाओं और यात्रियों के लिए प्रगतिशील रास्ता खोल दिया है।



अटल टनल(सुरंग) राजमार्ग के फ़ायदे

  अटल टनल राजमार्ग लेह और मनाली के बीच 46 किलोमीटर का फासला कम करती है यह सुरंग घोड़े के नाल के आकार में बनाई गई है  इस सुरंग के बनने से मनाली और लेह के बीच की दूरी जो कि पहले 474 किलोमीटर थी वो अब  घटकर 46 किलोमीटर की हो जाएगी   और यात्रा का समय 5 घंटे कम हो जाएगा अटल टनल की खासियत यह भी है कि 1 किलोमीटर पर निगरानी के लिए सीसीटीवी कैमरा भी लगाए गए हैं  इस टनल में एससीएडीए ( सेमी ट्रांसवर्स वेटिलेशन सिस्टम)  नियंत्रित अग्निशमन और  निगरानी के लिए सारी सुविधाएं की गई हैं। अब अटल सुरंग के द्वारा हथियार और राशन पहुंचना आसान होगा।सैनिकों को  इससे  बहुत  फायदा  होगा ।आपातकालीन स्थिति में  अब हम उनसे सही समय पे  संपर्क कर पाएंगे 



रोहतांग अटल टनल(सुरंग)

 अटल टनल 1600ट्रक के लिए तैयार की गई है जिसमें वाहनों कि अधिकतम गति 77किलोमिटर प्रति घंटा होगी अटल टनल का दक्षिण पोर्टल मनाली से 25किलोमिटर की दूरी पर हैं और उतरी पोर्टल 3071 मीटर की ऊंचाई पर है  पहले यह  घाटी छह महीने तक भारी बर्फबारी के कारण बंद रहा करती थी किंतु अब इस सुरंग के जरिए से हम पूरा साल इस घाटी से जुड़े रहेंगे।इस घाटी को हिमालय के पीर पंजाल की पर्वत श्रृंखला इससे और भी खूबसूरत बनती हैं अटल टनल के नीचे एक अन्य सुरंग का भी निर्माण किया गया है जिसे आपातकालीन स्थिति से निपटने के लिए मदद मिलेगी   इस सुरंग को बनाने को करीब चार हजार करोड़ रूपए खर्च हुए होंगे शुरुआत में इसका खर्च केवल चौदह सौ करोड़ रूपए इसकी  लागत आंकी थी। यह सुरंग विश्व की सबसे ऊंचाई वाली सुरंग बताई जा रही है। इस सुरंग में सुरक्षा के कड़े इंतजाम किए गए हैं हर 150मी की दूरी पर टेलीफोन कि भी व्यवथा है वायु की गुणवत्ता जाने के लिए रोहतांग दर्रा के नीचे  मशीन लगाई गई है इसको लगाने का फैसला 3जून 2000को लगाया गया था।और इसकी आधारशिला  26 मई 2002 को रखी गई थी



  

 अटल टनल से गुजरने वाली बस

अटल टनल से गुजरने वाली सबसे पहली बस ( एच आर टी सी) हिमाचल पथ परिवहन निगम की बस है जिसके बोर्ड में कैलांग अटल टनल रोहतांग मनाली लिखा गया था  इस बस को प्रधानमन्त्री मोदी जी ने हरी झंडी दिखाकर रवाना किया था यह दृश्य बेहद सुंदर और आरामदायक था बस के कुछ यात्रियों के नाम (  नोरबू राम जी, रमेश कुमार जी, देवीचंद जी,रामलाल जी, रामकृष्ण जी) आदि  ने इस बस में रोहतांग टनल की सैर की ओर पहले गवाह बने 


रोहतांग दर्रा

रोहतांग दर्रा सर्दी में भारी  बर्फबारी के कारण  बंद रहता है पूरा सर्दी में यहां बर्फ की एक सफेद चादर बिछी रहती है यहां से हिमालय के पर्वत श्रृंखला का खूबसूरत नजारा दिखता है यहां हर साल दुनिया भर से पर्यटक इस नजारे का लुत्फ उठाने आते हैं 



  कैसे पहुंचे

शिमला से आप चाहो तो टैक्सी या बस के द्वारा आराम से सफर कर सकते हैं आपको रास्ते में बहुत से स्टेशन मिलेगे आप चाहो तो किसी स्टेशन पे एक दिन आराम करके दूसरे दिन वहां की यात्रा आरम्भ कर सकते है शिमला से रोहतांग पास की दूरी 299किलोमिटर है   और शिमला से रोहतांग अटल टनल तक की दूरी 266.9 किलोमिटर हैं आपको यहां पहुंचने में 10 घंटे तक का समय भी लग सकता है।



 

 

 















गुरुवार, 1 अक्तूबर 2020

Kamro fort

कामरू किला किन्नौर जिले  का सबसे ऐतिहासिक किला है यह किन्नौर जिला में सांगला से 1की0 मी0  की दूरी पर टुकपा घाटी में कामरू गांव  में स्थित है  जिसे यहां के लोग मोने भी कहते है। यह किला समंद्र तल से लगभग 2600मी की उंचाई पर स्थित है। देवदार की लकड़ी और पत्थरो  से बना यह किला 1100साल पुराना बताया जाता हैं।  किले का पहला द्वार लकड़ी का बना हुआ है जिस पे खूबसूरत नकाक्षी की गई है इस किले के मुख्य द्वार पर भगवान बुद्ध की एक प्रतिमा  बनाई गई है जो पर्यटको का स्वागत करती है   और  किले के प्रांगण में मां कामाख्या देवी जी का मंदिर भी है जिसे  लोगों के दर्शन के लिए बनाया गया है यह किला पत्थरो और लकड़ी  के साथ बना सात मंजिला भवन हैं।  किले के एक तरफ देवदार के पेड़ों का खूबसूरत नजारा हैं। और दूसरी तरफ उंचे - ऊंचे पर्वत का नज़ारा हैं 




कामरू किले का इतिहास 
    कामरू किले का इतिहास बुशहर राजवंश से जुड़ा हुआ है। माना जाता है कि यह किला 1100साल पुराना है।साथ ही में किले के अंदर एक मंदिर है और है जिन्हे बद्रीनाथ मंदिर कहा जाता है इस मंदिर का इतिहास 15वी सदी का बताया जाता हैं।  इस मंदिर का इतिहास 15वीं सदी का बताया जाता है  यहां की अद्भुत बात यह है कि  इस  किले को सात गाँव ने मिल कर बनाया है किला बनाने वाले सात  गांव - छितकुल, सांगला, बट्सेरी, शोंग, रक्छम,चासू, कामरू इतियादी  हैं  यह बुशहर राजवंश का मूल बैठक  है जो यहां से शासन्  करती थी। यह हजारों सालों पहले भगवान बद्रीनाथ जी द्वारा बनाया गया था किले के अंदर लगभग 33 करोड़ देवी देवताओं का स्थान है कमरू बुशहर  रियासत की राजधानी है  जिस के संस्थापक श्री कृष्ण के पौत्र प्रद्युम्न है  ऐसा माना जाता है कि बुशहर रियासत के जितने भी राजा थे उन सभी का राजतिलक इसी किले में किया जाता  था जिनकी की संख्या  121 बताई जाती है कहा जाता है कि 121  रजाओं का राज तिलक इसी किले में हुआ है यह किला 121 राजाओं के इतिहास को खुद में समेटे खड़ा है इस धरोहर को संजोकर रखने के लिए इस किले को हम शत शत नमन करते है।




 मां कामाख्या देवी का इतिहास
        मां कामाख्या देवी जी को मां कामाक्षी देवी भी कहा जाता है।  स्थानीय लोगों द्वारा कहा जाता है कि मां कामाख्या देवी असम गुवाहाटी से लाई गई है    जिन्हे पर्यटकों के दर्शन के लिए लाया गया है किले का पहला द्वार पे बेहद सुंदर कलाकृति की गई है और दूसरे द्वार पर से खूसूरत नकशी  की गई है
क्योंकि पुराने परंपरा के अनुसार किले में जो भी व्यक्ति  प्रवेश करते हैं उन्हें  कमर  पर कमरबन्द (जिसे पहाड़ में गाचि कहा जाता है) और सिर पर टोपी पहन कर प्रवेश करना पड़ता है  यो यहां की पुरानी परंपरा है जो अभी तक निभाई जाती है हर साल यहां देवी के सम्मान के लिए एक बड़ा त्योहार आयोजित किया जाता है 
  


यात्रा का अच्छा समय
 कमरू किले के दर्शन का सबसे अच्छा समय अप्रैल से सितंबर के बीच का समय अच्छा रहता है। सर्दियों में यहां काफी ठंड होती है और बर्फ के आसार भी बहुत होते हैं। जिस वजह से आपको कठिनाईयों का सामना करना पड़ सकता है

 खाने की सुविधा
    यहां बोध धर्म के लोगो का बड़ा आग़ज़ है इसीलिए यहां 
उत्तर  भारतीय व्यंजनों का बड़ा महत्व है। यहां ज्यादा तर लोग तिब्बति व्यंजन खाना पसंद करते है इसलिए  यहां ढाबो में तिब्बती व्यंजन जैसे थुकपा, मॉमोज, चौमिन, पकोड़ी इतियादी 
उपलब्ध है 




कैसे पहुंचे
 आप कमरू किले तक बस या टैक्सी के माध्यम से भी आ सकते हैं आप अगर बस या टैक्सी के माध्यम से यात्रा करने चाहते हो तो  आपको दिल्ली, चण्डीगढ़,शिमला से आसानी से सांगला के लिए मिल जाएगी। 
 

नज़दिकी हवाई अड्डा
 सांगला में कोई हवाई अड्डा नहीं है। जुब्बलहट्टी हवाई अड्डा यहां का सबसे नजदीकी हवाईअड्डा है जो कि लगभग 238की0मी0 की दूरी पर है।











  












बुधवार, 16 सितंबर 2020

Kinnar Kailash Trek


किन्नर कैलाश महादेव


किन्नर कैलाश महादेव का घर माना जाना है इसलिेए  यह स्थान  पूजनिय हैं यह किन्नौर मेंं स्तिथ है  किन्नर कैलाश पर्वत   की ऊंचाई  समन्दर  तल से 24 हजार फीट  है  किन्नर कैलाश के शिवलिंग की एक मुख्य विशेषता यह है कि यह शिवलिंग दिन में कई बार रंग बदलता है हिन्दू धर्म में आस्था मानने वाले लोग और जो लोग चोनौतपुर्ण ट्रैक करना चाहते है ये  उनके लिए यह उत्तम   स्थान है यह यात्रा  इतनी कठिन और दुर्गम है कि इस यात्रा को यात्री इसे अपने जीवनकाल में बस एक   बार  ही कर पाता है। यह यात्रा शुरू होने पर तीर्थयात्रियों के लिए विभिन्न प्रकार की सुविधाएं भी उपलब्ध हैं।
  

 

   
 किन्नर कैलाश का भगवत गीता में वर्णन

 किन्नर कैलाश जो पुरणो में भी वर्णिंत है भगवत गीता में भी इस से   बहुत महत्व दिया गया है जिसके अंदर भगवान श्री कृष्ण ने हिमालय पर्वत को अपना घर बताते हुए हैं  कहां है कि मेरा निवास पर्वतों के राजा हिमालय में है' किन्नर कैलाश पर्वत पुरानी कथाओं में भी बहुत महत्व रखता है  किन्नर कैलाश पर्वत श्रृंखला  एक उद्गम स्थल है जहां से हमारी पवित्र गंगा नदी का उद्गम होता है 


 किन्नर कैलाश की मान्यताएं

 किन्नर कैलाश के बारे में वैसे तो कई मान्यताएं प्रचलित है परंतु कुछ  विद्वानों के अनुसार कहा जाता है कि महाभारत काल में किन्नर कैलाश पर्वत का नाम इंद्रकील पर्वत था जहां  भगवान शंकर और अर्जुन का युद्ध हुआ था और भगवान शंकर ने अर्जुन से प्रसन्न होकर उसे पशुपाता अस्त्र प्रदान किया था और यह भी कहा जाता हैं महाभारत काल में किन्नर कैलाश  को  वाणासूर कैलाश भी कहा जाता था कियोकि वाणासूर 
 शोणितपुर नगरी  का शासक था और महादेव का भक्त था वह महादेव की तपस्या करने किन्नर कैलाश आया करता था इससे पहले यह किन्नौर के शासक कामरू का मंत्री  था शोनितपुर नगरी को किन्नौर का प्रवेश द्वार भी कहा जाता है और अब शोणितपुर नगरी का नाम सराहन  बुशहर है यह भी मान्यता है कि पांडवों ने अपने वनवास काल का अंतिम समय यहीं गुज़रा था। 

 



किन्नर कैलाश  पर्वत श्रृंखला

 किन्नर कैलाश के शिवलिंग के चारो और परिक्रमा  करने की इच्छा से भारी संख्या में श्रद्धालु यहां आते हैं  हिमालय अनेक तरह के एडवेंचर के लिए भी विश्‍व प्रसिद्ध है। अगर धर्म की दृष्‍िट से देखा जाए तो यह बौद्ध और सिक्‍ख धर्मों के लिए भी बहुत महत्‍पूर्ण है। किन्नर कैलाश की एक एक खासियत यह भी है कि इस घाटी में 300 से भी ज्यादा मंदिर बने हुए हैं इसलिए ये घाटी बहुत महत्व रखती है किनर कैलाश महादेव की एक विशेषता यह भी है कि यह दिन में कई बार रंग बदलता है सूर्योदय से पहले यह थोड़ा सफेद रंग का और सूर्योदय होने के बाद थोड़ा पीला और शाम के वक़्त थोड़ा लाल होने लगता है। ऐसा क्यों है इसका रहस्य कोई भी सुलझा नहीं पाया है। 






1993 में शुरू हुई किन्नर कैलाश यात्रा

  पोराणिक कथाओं के अनुसार कहा जाता है कि  1993 से पहले किन्नर कैलाश यात्रा निषेद हुआ करती थी  यहां पर किसी का भी आना जाना मना था  किंतु 1993 के बाद किन्नर कैलाश को पर्यटको के लिए खोल दिया तभी से यहां भारी संख्या में पर्यटक दूर दूर महादेव के दर्शन करने  आते है यह यात्रा पे आने वाले  पर्यटको के लिए एक चुनौतपूर्ण ट्रैक है जिसे यात्री बहुत मश्कत से पूरा करते है। इस यात्रा का आयोजन हर साल अगस्त महीने में  किया  जाता हैं।
  
   

 किन्नर कैलाश की यात्रा 

 यात्रियों को  सबसे पहले  इंडों तिब्बत बार्डर पुलिस  (आइ.टी.बी .पी)  पोस्ट पर यात्रा के लिए  अपना पंजीकरण 
करना होता है  जो कि किन्नौर जिले से 41की0मी0 की दूरी पर स्थित है इसके बाद आपको चारंग  गांव के लिए निकलना पड़ता है   जिसमें आपको 8 से 9 घण्टे तक का समय भी लग सकता है आपको वहां स्वस्थ्य विभाग का गेस्ट हाउस बना हुआ मिलेगा इसके बाद आपको लालनती के लिए जाना पड़ेगा जिसमें आपको 7 घंटे तक का समय लग जाएगा। किन्नर कैलाश पर स्थित शिवलिंग जिसका श्रद्धालू  परिक्रमा करते है उसके उसकी शुरुआत कल्पा और त्रिउंग घाटी से होती हैं और उसके बाद दोबारा कल्पा से होते हुए सांगला घाटी की ओर मुड़ती है 

 


यात्रा के पड़ाव 

किन्नर कैलाश जाने के 2 मार्ग है पहला लालांती दर्रा 14,501 फीट की उंचाई पर स्थित है और दूसरा रास्ता चारांग दर्रा है जो 17,218 फीट की ऊंचाई पर स्थित है यात्रा के पड़ाव पार्वती कुंड का बहुत महत्व है इस ट्रैक में आपको तीखे चट्टान का  ओर  तेज तर्रार झरनों    का सामना भी करना पड़ता है  कुछ ही दूरी पर आप मंत्र मुगद करने वाले पहाड़ दिखाई देंगे ओर बदलो कि खूसूरती नजर आयेगी वो नज़ारा देख कर आप थकान रहित महसूस करेगें । उसके बाद आप गणेश पार्क पहुंच जाएंगे।

 गणेश पार्क में रहने की पूरी सुविधाएं उपलब्ध हैं यहां का ठंडा मौसम आपको माइनस (-) में मिलेगा इसलिए आपको वस्त्रो का विशेष ध्यान रखना होगा।   गणेश पार्क  से 500मी की दूरी पर  पार्वती कुंड है और पार्वती कुंड से  किन्नर कैलाश के लिए 2 घंटे का समय लगता है  गणेश  पार्क के बाद हम गणेश गुफा के दर्शन करते है    पार्वती  कुंड यात्रियों के लिए बहूत पुजनिय  स्थल  माना जाता है  मानयता यह भी है कि भक्त अपनी यात्रा पुर्ण करने के लिए इस कुंड में सीक्का डालते है और यहां स्नान करने के बाद ही किन्नर कैलाश के लिए प्रस्थान करते है।  और किन्नर कैलाश पहुंच कर महादेव के दर्शन करते है। इस चड़ाई को पूरा करने में 2 दिन का समय निकाल जाता है हालाकि कुछ लोग इस ट्रैक को 1 दिन में भी पूरा करते है। किन्नर कैलाश जाने के 2 मार्ग है पहला लालांती दर्रा 14,501 फीट की उंचाई पर स्थित है और दूसरा रास्ता चारांग दर्रा है जो 17,218 फीट की ऊंचाई पर स्थित है 
   
कैसे पहुंचे
शिमला में आपको बस और टैक्सी दोनों की सुविधाएं उपलब्ध हैं आप चाहो तो बस द्वारा और चाहो तो टैक्सी के द्वारा भी 
 यात्रा का आनंद ले सकते है  शिमला से किन्नर कैलाश तक का मार्ग  आपको शिमला के बाद का स्टेशन कुफरी मिलेगा  आप चाहो तो वहां ठहर के ठंडे मौसम का आनंद भी ले सकते हैं। उसके बाद आपको ठियोग स्टेशन मिलेगा और फिर नारकंडा से होकर  आप रामपुर के लिए रवाना होंगे आप चाहो तो एक शाम वहां गुजार सकते है आप 8 घंटों के सफ़र में बहुत थकान महसूस करेंगे जिससे आप यहां कुछ समय थहर कर भी आराम कर सकते हो  इसके बाद आपको ज्यूरी पहुंच जाएंगे और जयुरी पहुंचने के बाद आप चाहो तो किन्नौर के प्रवेश द्वार सराहन बुशहर भी जा सकते है उसके बाद आप त्रंडा ढांक में रुकेंगे पर वहा माता चित्रलेखा के दर्शन प्राप्त कर आगे बढ़ेंगे और आप चौरा चेक पोस्ट पे रुकेंगे और उसके बाद आप  बावानगर  पहुंचते है उसके बाद वांगतु उसके बाद  और फिर रिकांगपिओ पहुंचेंगे 



साथ ले जाने की आश्यकता

 आपको अपने साथ गरम कपड़े और अच्छे ग्रीप वाले जूते और तंबू  ओर कम्बल, गुलोकोज, पॉवर बैंक, टॉर्च,डंडा,पानी की बोतल, खाना  खाने के लिए चीजें लेकर जानी पड़ेगी   आमतौर पर यात्रा शुरू होने पर तीर्थयात्रियों के लिए विभिन्न प्रकार की सुविधाएं उपलब्ध करवाई जाती है कुछ ख़रीद के करनी पड़ती हैं  
 









 




  

     





गुरुवार, 13 अगस्त 2020

sisma mata mandir in hindi

एक ऐसा मंदिर जहां मात्र  सोने से हो जाती है  संतान की प्रापति 

 हिमाचल को  देव भूमि के नाम से ऐसे ही नहीं जाना जाता यहां पर बहुत  सारे मंदिर  है।  और  उन सब की अपनी  अपनी मान्यताएं है। उन्ही में से यह भी एक मन्दिर है

हिमाचल प्रदेश के मंडी जिले के लड-भड़ोल तहसील के सिमस नामक खूबसूरत स्थान पर स्थित माता सिमसा मंदिर दूर दूर तक प्रसिद्ध है। 

देवी सिमसा की स्थापना के पीछे ऐसी ही लोक मान्यता और विश्वास है जो इस मंदिर को एक अलग पहचान और महत्व दिलाता है.

माँ देती है “सलिन्दरा”

माता सिमसा या देवी सिमसा को संतान-दात्री के नाम से भी जाना जाता है. हर वर्ष यहाँ सैंकड़ो नि:सन्तान दंपति सन्तान पाने की इच्छा ले कर माता सिमसा के दरबार में आते हैं.

माता सिमसा मंदिर में नवरात्रों में होने वाले इस विशेष उत्सव को स्थानीय भाषा में “सलिन्दरा” कहा जाता है. सलिन्दरा का अर्थ है स्वप्न अथवा ड्रीम

नवरात्रों में महिलाएं सोती हैं फर्श पर

नवरात्रों में नि:संतान महिलायें माता सिमसा मंदिर परिसर में डेरा डालती हैं और दिन रात मंदिर के फर्श पर सोती हैं.


विश्वास है कि जो महिलाएं माता सिमसा के प्रति मन में श्रद्धा लेकर से मंदिर में आती है माता सिमसा उन्हें स्वप्न में मानव रूप में या प्रतीक रूप में दर्शन देकर संतान का आशीर्वाद प्रदान करती है.


मान्यता के अनुसार, यदि कोई महिला स्वप्न में कोई कंद-मूल या फल (fruit) प्राप्त करती है तो उस महिला को संतान का आशीर्वाद मिल जाता है.

देवी सिमसा आने वाली संतान के लिंग-निर्धारण का भी संकेत देती है. जैसे कि, यदि किसी महिला को अमरुद का फल मिलता है तो समझ लें कि लड़का होगा. अगर किसी को स्वप्न में भिन्डी प्राप्त होती है तो समझें कि संतान के रूप में लड़की प्राप्त होगी.


यदि किसी को धातु, लकड़ी या पत्थर की बनी कोई वस्तु प्राप्त हो तो समझा जाता है कि उसके संतान नहीं होगी.

स्वप्न के बाद छोड़ना पड़ता है बिस्तर

इस तरह के होने वाले स्वप्न के तुरंत बाद श्रद्धालु औरत मंदिर से अपना विश्राम या धरना समाप्त करके जा सकती है.

माना जाता है कि नि:संतान बने रहने का प्रतीक-स्वरुप स्वप्न प्राप्त होने के बाद भी यदि कोई औरत दूसरा स्वप्न देखने का हठ करती है और अपना बिस्तर मंदिर परिसर से नहीं हटाती है तो उसके शरीर में खुजली भरे लाल-लाल दाग उभर आते हैं और उसे मजबूरन वहां से जाना पड़ता है.


कई मामलों में तय अवधि कि समाप्ति तक महिला के स्वप्न में कुछ नहीं आता. इसका अर्थ संभवत: नकारात्मक ही होता है परन्तु वे अगली बार प्रयास अवश्य कर सकती हैं.

आभार प्रकट करने आते हैं दम्पति

संतान प्राप्ति के बाद लोग अपना आभार प्रकट करने सगे-सम्बन्धियों और कुटुंब के साथ माता सिमसा मंदिर में आते हैं. यहाँ के आसपास और दूर पार के इलाकों में ऐसे कई दम्पति मिल जाते हैं जिन्हें माता के स्वप्न के बाद संतान की प्राप्ति हुई।

इसे “सामूहिक संयोंग” कहें या कुदरत का चमत्कार लेकिन यहाँ आने वाले श्रद्धालुओं के अटूट विश्वास को देख कर तो यही लगता है कि कुछ ऐसा है जो ज्ञान-विज्ञानं और मानवीय समझ से परे है.

दूर -दूर से आते हैं श्रद्धालु

माता सिमसा मंदिर पक्के सड़क संपर्क मार्ग से जुड़ा है. यहाँ वर्ष भर श्रद्धालुओं का तांता लगा रहता है. खासतौर पर नवरात्रों में यहाँ भीड़ अधिक रहती है तथा उत्सव का माहौल होता हैगर्मियों के मौसम में यहाँ 2 दिवसीय मेला लगता है जिसमे दूर -दूर से लोग माँ के दरबार में हाजरी भरने आते हैं.

ऐसे पहुंचें माँ के दरबार


 

हवाई अड्डा 

  नजदीकी हवाई अड्डा काँगड़ा के गगल में स्थीत है वहां से आप टैक्सी या बस से पहले बैजनाथ पहुंचे  बैजनाथ से सिमसा माता मंदिर पहुंचे गगल से बैजनाथ की  दुरी 55     किलोमीटर  बैजनाथ से सिमसा  माता मंदिर की दुरी  28   किलोमीटर  है बैजनाथ तक बस  सर्विस बहुत अछि है। बैजनाथ से सिमसा माता मंदिर के लिए समय समय पर बस जाती है 

निकटतम रेलवे स्टेशन 

सबसे नजदीकी  रेलवे स्टेशन पठानकोट में है। और नेरौ गेज  रेलवे स्टेशन बैजनाथ तक  है  पठानकोट रेलवे स्टेशन  के  लिए देश  के बड़े रेलवे स्टेशनो से  रेल मिल जाएगी। पठानकोट से नेरौ गेज रेल से  भी बैजनाथ पहुंच सकते है या  पठानकोट से बस या टैक्सी  के माध्यम से भी बैजनाथ पहुंच सकते है। पठानकोट से  बैजनाथ की  दुरी 130 किलोमीटर है 


सड़क  यात्रा 

दिल्ली isbt kasmirigate से बैजनाथ  सीधी बस  है चंडीगढ़ sector43 ,शिमला, चम्बा , से भी आपको बैजनाथ की बस  जाएगी  दिल्ली से  बैजनाथ की दुरी 501  किलोमीटर है।  

अगर कोई श्रद्धालु चाहे मंडी या काँगड़ा की तरफ से आ रहा हो तो वह पहले बैजनाथ तक पहुंचे. उसके बाद माँ का दरबार यहाँ से मात्र  28  किलोमीटर दूरी पर है


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